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क्या मंदिर , क्या मस्जिद ....

Posted On: 24 Mar, 2017 कविता में

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….क्या मंदिर ,क्या मस्जिद आखिर क्या है ये सब एक विश्वास और आस्था .क्या इनके बिना जीवन की कल्पना नहीं हो सकती है ..क्या इनके बिना इंसान की पहचान नहीं हो सकती है , ..हम रोज़ सुबह उठते है और नहा धोकर पूजा करते है अगर गलती से घर में कुछ गलत हो जाये , तो हम चिल्लाते है…मारते है…तो क्या ये आस्था हमे यही सिखाती है ..कि आप घर में दुर्व्यहार करे …अपने माँ-बाप , अपने बच्चो के साथ अनैतिकता का व्यहवार करे और ऐसे घर में पूजा , आस्था ,विश्वास जैसे परंपरा रहेगी …मैं कहती हूँ …नहीं मंदिर तो वो है जहाँ पति-पत्नी का एक दूसरे से सम्मान , बच्चो के लिए प्यार , बड़ो की सेवा ..अगर ऐसे घर में पूजा भी ना हो …तो वो घर खुद एक मंदिर है!

आज हमारा देश मंदिर, मस्जिद के नाम पर बट गया है , यहाँ तक की हमारे जानवर , हमारा पहनावा , रंग, खाना ये सब एक बटा हुआ है आखिर क्यों..ये तो कुदरत के देन है और तो और अयोध्या का जमीं तक भी मंदिर और मस्जिद के नाम पर बट गया है आखिर क्यों…जमीं तो एक ही है..मंदिर बने या फिर मस्जिद ….हमारी आस्था कम तो नही हो जाएगी….या फिर हमारा देश बदल जायेगा .यह फिर बारिश आधे जमीं पर होगी और आधे जमीं पर धुप होगा …या फिर कोई इन्साफ ? ….हम किस इन्साफ की बात कर रहे है ?….आखिर किस हक़ की बात कर रहे है…अगर कुदरत ने हम लोगो के साथ कोई भेदभाव नहीं किया है.. तो हम कौन होते है उसे अलग करने वाले …हमे किसने हक़ दिया …कुदरत ने….? या फिर इंसानियत ने ? नहीं …हमे हक़ सिर्फ़ हमारे अहंकार ने दिया ….ना धर्मो ने दिया है…और ना हमारे अधिकारों ने….ऐसा कोई किताब नहीं है …जो हमे भेदभाव सिखाये …लेकिन …हम सिख रहे है….और यही भावना हम अपने आने वाले भावी पीढ़ी को भी दे रहे है!

म तो कहते है…अयोध्या के जमीं पर मंदिर और मस्जिद बनवाने की जगह पर क्यों ना एक ऐसा विद्यालय खुला जाये …जहाँ सभी धर्मो के बच्चे …वो गरीब बच्चे जो शिक्षा से वंचीत है ..उन्हें ये अधिकार दे…भला शिक्षा से कोई बड़ा ..मंदिर है….या फिर कोई मस्जिद ?….. हम तो इस बात पर सहमत है क्या आप लोग है….क्योंकि इस देश में मंदिर और मस्जिदों की नहीं …शिक्षा की बहुत ज़रूरत है….जहाँ मंदिर और मस्जिद दोनों की आस्था है….और जहाँ आस्था है वह पर सत्यता भी है…और जहाँ पर सच्चाई है…वह धर्मो की ज़रूरत नहीं है..और वह मंदिर और मस्जिद की भी ..!

अगर मेरी बाते …किसको खेद पहुचाए ….तो माफ़ करियेगा.अगर मैंने कुछ गलत लिख दिया है …पर मुझे लगता है…की आप लोग भी मेरे इस बात पर सहमत होंगे..!
शालिनी शर्मा

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shakuntla mishra के द्वारा
March 26, 2017

मंदिर तो हमारा था तोडा बाबर ने हम तोअपनी ही जमी पर है भेद कौन कर रहा है

    shalini rakesh kr. के द्वारा
    March 26, 2017

    ….जमीं तो किसी का नही होता है…..मंदिर बने या मस्जिद …हमारा इसमें क्या …फायदा है….हिंदुत्व तो अंदर से होना चाहिए…संस्कार तो अंदर से होना चाहिए …जो अब खत्म होता जा रहा है….हमारी ही संस्कृति अब हमसे दूर है…….!


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